संघ शताब्दी वर्ष पर काकनवानी में विराट हिन्दू सम्मेलन, पंच परिवर्तन का लिया गया संकल्प
हजारों की सहभागिता के साथ सम्पन्न हुआ विराट हिन्दू सम्मेलन

काकनवानी / राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के पावन अवसर पर काकनवानी में विराट हिन्दू सम्मेलन का भव्य, गरिमामय एवं ऐतिहासिक आयोजन संपन्न हुआ। सम्मेलन का उद्देश्य सनातन संस्कृति की सुदृढ़ता, सामाजिक समरसता और हिन्दू एकता को और अधिक सशक्त बनाना रहा। इस अवसर पर संघ द्वारा आह्वान किए गए पंच परिवर्तन को जीवन में आत्मसात कर राष्ट्र निर्माण में सहभागी बनने का सामूहिक संकल्प लिया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंचासीन अतिथियों द्वारा भारत माता के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। सम्मेलन में
परम पूज्य संत श्री रघुवरदास जी महाराज, नीलम जी भट्ट तथा मुख्य वक्ता के रूप में रतलाम विभाग के जनजाति कार्य प्रमुख श्री राजेश डावर की गरिमामयी उपस्थिति रही।
अपने ओजस्वी और प्रेरणादायी उद्बोधन में संत श्री रघुवरदास जी महाराज ने कहा कि आज का यह सम्मेलन केवल आयोजन नहीं, बल्कि धर्म और संस्कृति की रक्षा का एक जागृत संकल्प है। उन्होंने कहा कि सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही सनातन धर्म का अस्तित्व रहा है, इसी कारण इसे सत्य सनातन धर्म कहा जाता है। धर्म का पालन व्यक्ति को संघर्षों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है और भयमुक्त बनाता है। निर्भय समाज ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। उन्होंने हनुमान जी के चरित्र का उदाहरण देते हुए कहा कि धर्मनिष्ठा से अंतर्निहित शक्ति जागृत होती है। साथ ही “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” श्लोक के माध्यम से भारत भूमि की महिमा का भावपूर्ण वर्णन किया।

मुख्य वक्ता श्री राजेश डावर ने जनजाति समाज की गौरवशाली संस्कृति, परंपराओं एवं जीवन पद्धति पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गांवों की मूल परंपराओं से जुड़े रहकर ही समाज की जड़ों को मजबूत किया जा सकता है। बाबा देव, बाबी माता, सावन माता, खेड़ापति हनुमान की उपासना के साथ-साथ जातर, चलावणी, मांडला, ज्वारे जैसी परंपराएं हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं, जिन्हें हमारे पूर्वजों ने पीढ़ी दर पीढ़ी सहेज कर रखा है। उन्होंने समाज को सनातन मूल्यों से विमुख करने वाली विभाजनकारी और वामपंथी विचारधाराओं से सजग रहने का आह्वान किया।
संघ के शताब्दी वर्ष के अंतर्गत पंच परिवर्तन—सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी का आग्रह एवं नागरिक कर्तव्य—को अपनाकर राष्ट्र सेवा में सक्रिय भूमिका निभाने का संकल्प सम्मेलन में दोहराया गया। सम्मेलन में हजारों की संख्या में समाजजनों की सहभागिता रही, जिससे यह आयोजन अत्यंत भव्य, प्रेरणास्पद और ऐतिहासिक बन गया।



