झाबुआ
बसंत ऋतु के दो माह में प्रकृति भी आनंदित होती है यह दिन माँ सरस्वती की आराधन पूजा का दिन – रघूवरदास जी

*पिटोल* – जिस दिन सृष्टि में रस भरा, जिस दिन कान में शब्द पडा ओर जिस दिन ब्रम्हाण्ड प्रसन्न हुआ वह दिन बसंत पंचमी का दिन था। मौन सृष्टि जिस दिन मांॅ शारदा की कृपा से आल्हादित होकर प्रफुल्लित हुई। मां सरस्वति के हाथ में पकडी वीणा का वादन हुआ उस दिन से ही प्रकृति में संगीत का प्रार्दुभाव हुआ इस दिन को हम बसंत पंचमी के नाम से जानते है। आज के दिन माॅ सरस्वति के पूजन अर्चन का विशेष महत्व है यह उद्गार प्रसिद्ध गौ संत श्री रघूवरदास जी महाराज तलवाडा (राजस्थान) ने पिटोल के राधा कृष्ण मंदिर में बसंत पंचमी के पूजन अर्चन में उपस्थित भक्त समुदाय को बसंत पंचमी क्यों ओर उसका क्या महत्व पर व्याख्या करते हुवे बताई।

*राधा कृष्ण का विवाह भी आज ही के दिन*
आपने अपने व्याख्यान में आगे बताया कि राधा कृष्ण के अटूट प्रेम बंधन को देखकर ब्रम्हा जी ने आज ही के दिन उन दोनों का विवाह करवाया था इसलिये भी व सीता की खोज में 13 माह लंका गऐ राम जी द्वारा रावण वध के पश्चात राम जी का माता सीता से मिलन हुआ था वह दिन भी बसंत पंचमी का दिन था इसलिये इस दिन का भी विशेष महत्व है। आपने कहा कि अपनी वाणी सौंदर्य, वाक पटुता, उच्च शिक्षण व प्रभावी वक्ता के रुप में रुचि रखने वाले विध्यार्थी, व छोटे बडे जन मानस को आज के दिन माॅ सरस्वति की पूजा कर उन्हें पीले व्यंजन का नेवेद्य अवश्य लगाना चाहिये। रघूवरदास जी प्रयागराज से लौटकर अपने तलवाडा आश्रम पहुंचने के पुर्व एक दिवसिय प्रवास पर यहां पिटोल पहुंचे थे। आपने क्षैत्र के समुचे सनातनी भक्त मंडल व क्षैत्र वासियों को बसंत पंचमी की हार्दिक बधाई थी।




